Rail Route Change Triggers Environmental Concern In Panna, Thousands More Trees May Be Felled
पन्ना। पन्ना जिले की बहुप्रतीक्षित ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। रेलवे द्वारा रेल लाइन के प्रस्तावित मार्ग में बदलाव किए जाने के बाद पर्यावरण को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का दावा है कि नए रूट के कारण 50 हजार से अधिक अतिरिक्त पेड़ों की कटाई करनी पड़ सकती है।
जानकारी के अनुसार, परियोजना के पहले चरण में पन्ना के अजयगढ़ क्षेत्र में रेलवे ट्रैक निर्माण के लिए लगभग 52 हजार पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। जंगल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सफाई कर निर्माण कार्य शुरू किया गया था। अब मार्ग परिवर्तन के बाद एक बार फिर हजारों पेड़ों की कटाई की तैयारी की खबरों ने चिंता बढ़ा दी है।
बताया जा रहा है कि उत्तर वन मंडल के अजयगढ़ क्षेत्र में ही करीब 31 हजार से अधिक पेड़ों पर दोबारा संकट मंडरा रहा है। इसके अलावा परियोजना का प्रभाव आसपास के वन क्षेत्रों और वन्यजीव गलियारों पर भी पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर आशंका जताई जा रही है कि इससे क्षेत्र की जैव विविधता और वन संपदा को बड़ा नुकसान हो सकता है।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि पन्ना क्षेत्र पहले से ही पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक ओर केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर रेल परियोजना के लिए अतिरिक्त पेड़ों की कटाई की संभावना ने वन संरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
पन्ना का वन क्षेत्र देश के महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में शामिल है। कभी बाघों के लगभग समाप्त हो जाने के बाद यहां पुनर्वास कार्यक्रम चलाकर बाघों की संख्या को दोबारा बढ़ाया गया था। वर्तमान में क्षेत्र में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, ऐसे में वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप को लेकर विशेषज्ञ भी चिंता जता रहे हैं।
हालांकि रेलवे और संबंधित विभागों की ओर से मार्ग परिवर्तन के पीछे सुरक्षा और तकनीकी कारणों का हवाला दिया जा रहा है। बताया जा रहा है कि रेल संचालन को अधिक सुरक्षित बनाने और भविष्य में संभावित जोखिमों से बचने के लिए रूट में बदलाव किया गया है।
फिलहाल परियोजना को लेकर पर्यावरणीय प्रभाव, वन संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती सामने है। स्थानीय लोग और पर्यावरण विशेषज्ञ मांग कर रहे हैं कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले विस्तृत पर्यावरणीय मूल्यांकन किया जाए ताकि विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों की भी रक्षा हो सके।
