JNU में कंप्यूटर साइंस में पीएचडी के एक शोधार्थी के नजरिए से, हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर हुआ विवाद केवल एक प्रशासनिक या राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बड़े स्तर पर डेटाबेस मैनेजमेंट और सिस्टम सिक्योरिटी से जुड़ी एक गंभीर चिंता है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और इलेक्टोरल-रोल (electoral-roll) प्रबंधन से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।
इस मामले में तकनीकी रूप से सबसे चिंताजनक पहलू ERONet पोर्टल के एक्सेस को केंद्रीकृत (centralise) करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय चुनाव अधिकारियों को वोटर डेटाबेस के उचित एक्सेस से वंचित किया गया। इसके साथ ही, बिना उचित वैधानिक प्रक्रिया या नियमों में संशोधन किए नए वोटर्स के लिए फॉर्म 6 (Form 6) में मनमाने बदलाव करना, सीधे तौर पर सिस्टम की सत्यनिष्ठा (integrity) और डेटाबेस के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन है।
जब किसी बड़े और संवेदनशील IT इंफ्रास्ट्रक्चर में ‘चेक्स एंड बैलेंसेज’ (checks and balances) को दरकिनार किया जाता है, तो विपक्ष द्वारा लगाए गए ‘वोट चोरी’ और संस्थागत छेड़छाड़ के आरोप तकनीकी दृष्टिकोण से भी चिंता का विषय बन जाते हैं। यद्यपि चुनाव आयोग (ECI) ने अपने बचाव में यह स्पष्ट किया है कि ये आपत्तियां एक सामान्य आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा थीं और SIR से जुड़े अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे, लेकिन इलेक्टोरल-रोल सॉफ्टवेयर (electoral-roll software) में अनधिकृत बदलावों की खबरें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
एक पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए यह नितांत आवश्यक है कि चुनाव आयोग का डिजिटल और डेटाबेस इंफ्रास्ट्रक्चर किसी एक व्यक्ति के एकाधिकार में न होकर पूरी तरह से सुरक्षित, विकेंद्रीकृत (decentralised) और पारदर्शी हो।
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