मध्य प्रदेश: के उमरिया जिले का मोहर्रम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत उदाहरण है। यहां पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी लोगों के बीच प्रेम, विश्वास और भाईचारे का संदेश दे रही है। वर्ष 1882 से शुरू हुई यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है, जो इसे देशभर में एक अलग पहचान दिलाती है।
उमरिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मोहर्रम की सवारी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा का निर्वहन एक हिंदू परिवार करता आ रहा है। पिछले 143 वर्षों से लगातार यह परिवार मोहर्रम की सवारी निकालने का दायित्व निभा रहा है। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन यह परंपरा कभी नहीं टूटी।
इतना ही नहीं, वही उमरिया मे हिंदू परिवार ताजिया बनाने का कार्य भी कर रहा है। मोहर्रम की 10 तारीख से ताजिए के निर्माण की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। परिवार के सदस्य पूरी श्रद्धा, मेहनत और पारंपरिक विधि से ताजिया तैयार करते हैं, जिसे मोहर्रम के दौरान पूरे सम्मान के साथ सवारी में शामिल किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
उमरिया के मोहर्रम की एक और खास पहचान यह है कि यहां निकलने वाली सवारी में मुस्लिम समाज के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई बार सवारी में शामिल होने वाले हिंदुओं की संख्या मुस्लिमों से भी अधिक होती है। सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ शामिल होकर भाईचारे और आपसी सौहार्द का संदेश देते हैं। यही कारण है कि उमरिया का मोहर्रम सांप्रदायिक सद्भाव की एक मिसाल माना जाता है।
मोहर्रम के दौरान पूरे हिंदुस्तान के बड़े शहरों से श्रद्धा, अनुशासन और आपसी सहयोग का वातावरण देखने को मिलता है। विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे की व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं और आयोजन को सफल बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह परंपरा नई पीढ़ी को भी सामाजिक एकता, पारस्परिक सम्मान और साझा सांस्कृतिक विरासत का महत्व सिखाती है।
आज जब समाज में एकता और सौहार्द की मिसालों की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, ऐसे समय में उमरिया का मोहर्रम पूरे मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह आयोजन इस बात का संदेश देता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में एकता, पारस्परिक सम्मान और भाईचारे की भावना में निहित है। उमरिया की यह ऐतिहासिक परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेम, सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का संदेश देती रहेगी।
