US-China G2 Debate Resurfaces Ahead of Trump-Xi Summit in Beijing
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज दो दिवसीय दौरे पर चीन की राजधानी बीजिंग पहुंच रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होगी। यह शिखर सम्मेलन पहले मार्च में प्रस्तावित था, लेकिन ईरान युद्ध के चलते इसे टाल दिया गया था। अब इस मुलाकात ने एक बार फिर दुनिया में “G2” यानी अमेरिका और चीन द्वारा वैश्विक शक्ति संतुलन को नियंत्रित करने की बहस को हवा दे दी है।
हाल के महीनों में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के कथित अपहरण और ईरान युद्ध जैसे मुद्दों पर चीन की सीमित प्रतिक्रिया ने कई सवाल खड़े किए हैं। चीन को ईरान संकट से आर्थिक नुकसान हुआ है, खासकर तेल आयात के मोर्चे पर, फिर भी उसने अमेरिका के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच दुनिया को प्रभाव क्षेत्रों में बांटने को लेकर कोई “मौन समझ” बन रही है।
क्या दुनिया दो हिस्सों में बंट रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की आक्रामक विदेश नीति ने अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों—खासकर यूरोप और भारत—के भरोसे को कमजोर किया है। दूसरी ओर चीन वैश्विक स्तर पर अपनी आर्थिक और रणनीतिक ताकत लगातार बढ़ा रहा है। ऐसे में ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक को कई लोग दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों के बीच नए समीकरण के रूप में देख रहे हैं।
रिटायर्ड सैन्य अधिकारी जेएस सोढ़ी का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच एक तरह की अनकही समझ बनती दिखाई दे रही है—जिसमें दोनों एक-दूसरे के प्रभाव क्षेत्रों में सीधा हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। यही कारण है कि “G2” की अवधारणा फिर चर्चा में है।
क्या है G2 का विचार?
“G2” यानी “ग्रुप ऑफ टू” की अवधारणा पहली बार 2005 में अमेरिकी अर्थशास्त्री एफ. फ्रेड बर्गस्टेन ने दी थी। इसका मकसद दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं—अमेरिका और चीन—को वैश्विक आर्थिक स्थिरता की साझा जिम्मेदारी देना था।
बराक ओबामा के दौर में भी यह विचार सामने आया था। 2009 में ओबामा और तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के बीच “रणनीतिक और आर्थिक संवाद” शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच सहयोग को बढ़ाना था। हालांकि उस समय इसे किसी वैश्विक वर्चस्व की योजना नहीं माना गया था।
भारत, रूस और यूरोप के लिए क्या मतलब?
G2 की चर्चा इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे यह आशंका पैदा होती है कि दुनिया बहुपक्षीय व्यवस्था से हटकर दो महाशक्तियों के प्रभुत्व वाली व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है। ऐसे में भारत, रूस, फ्रांस और यूरोपीय संघ जैसे देशों की भूमिका सीमित हो सकती है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। ट्रंप प्रशासन की नीतियों से नई दिल्ली और वॉशिंगटन के रिश्तों में अनिश्चितता बढ़ी है। वहीं रूस भी शायद ऐसी किसी वैश्विक व्यवस्था को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें उसकी भूमिका कमजोर हो जाए।
क्या सचमुच बन रहा है G2?
ब्रिटेन के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की विशेषज्ञ जिंग गु के मुताबिक, ट्रंप-शी मुलाकात को सीधे G2 की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि यह बैठक दरअसल दोनों देशों के बीच “रणनीतिक सीमाओं” को समझने और टकराव से बचने की कोशिश है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका और चीन दोनों यह समझ चुके हैं कि अकेले दुनिया पर प्रभुत्व कायम रखना अब संभव नहीं है। इसलिए दोनों देश प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ संतुलन और सहअस्तित्व का रास्ता तलाश रहे हैं।
फिलहाल यह साफ नहीं है कि G2 वास्तव में आकार ले रहा है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात आने वाले वर्षों की वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
