Debate Continues Over UGC Rules After Supreme Court Stay, Government Reconsiders ‘False Complaint’ Clause
सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी UGC नियमों पर बहस जारी, सरकार कर रही है नए विकल्पों पर विचार
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी (UGC) के नए नियमों पर रोक लगाए जाने के बावजूद यह मुद्दा अभी शांत नहीं हुआ है। सवर्ण समुदाय के लोग इस मामले में केंद्र की मोदी सरकार का रुख जानना चाहते हैं। इसी बीच खबर है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय 2025 के ड्राफ्ट में शामिल रहे ‘झूठी शिकायतों’ से जुड़े क्लॉज को दोबारा लाने पर विचार कर रहा है। यह क्लॉज बाद में फाइनल नियमों से हटा दिया गया था।
यूजीसी के नियमों का विरोध क्यों हो रहा है?
सवर्ण समुदाय का कहना है कि अगर झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई सजा तय नहीं की गई, तो इन नियमों का दुरुपयोग कर उन्हें परेशान किया जा सकता है। विरोध कर रहे लोगों का यह भी कहना है कि नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को शामिल कर लिया गया है, जबकि 2012 के नियमों में ऐसा नहीं था। उनका तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग को उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव के मामलों में कोई प्रभावी समाधान नहीं मिलेगा। हालांकि, OBC को नियमों से बाहर करना आसान नहीं माना जा रहा है।
सरकार क्या बदलाव कर सकती है?
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि झूठी शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा प्रावधानों को फिर से जोड़ा जाए या नहीं। इसके साथ ही भेदभाव-विरोधी व्यवस्था के दायरे को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) तक बढ़ाने की संभावना भी देखी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाते हुए कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने कहा कि ये नियम सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं और जाति-विहीन समाज के उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
नियमों की धारा 2 और 3(c) में लाभार्थियों को ‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग’ के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC के खिलाफ भेदभाव के रूप में बताया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि ड्राफ्ट नियमों में OBC का उल्लेख नहीं था, लेकिन फाइनल नियमों में इसे जोड़ दिया गया।
ड्राफ्ट नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के लिए दंड का प्रावधान भी था। इसके तहत झूठी भेदभाव की शिकायत करने पर समानता समिति द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता था और बार-बार या गंभीर मामलों में संस्थागत नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान था, जिसे बाद में हटा दिया गया।
