Is Iran's counterattack on Israel a sign of World War III?
क्या जलता ईरान तीसरे विश्व युद्ध का ट्रिगर प्वाइंट बन सकता है?
क्या इजरायल पर ईरान का पलटवार थर्ड वर्ल्ड वॉर की दस्तक है?
क्या 2026 में दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है?
मिडिल ईस्ट में लगी आग सिर्फ एक इलाके की आग नहीं है। अगर यह और भड़की, तो इसकी लपटें सीधे दुनिया की महाशक्तियों तक पहुंच सकती हैं। क्योंकि इस टकराव में ईरान पूरी तरह अकेला नहीं है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने साफ कहा है कि Russia और China हमेशा ईरान के साथ खड़े रहे हैं।
अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान को भारी नुकसान हुआ है। कई शहर तबाही का सामना कर रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ईरान इस लड़ाई में बिल्कुल अकेला रह जाएगा, या उसके साथ खड़े होने वाले दोस्त भी हैं? जवाब है—दोस्त हैं, भले ही सामने से नहीं तो पर्दे के पीछे से।
रूस, चीन और ईरान की दोस्ती आज की नहीं है। यह लंबे समय से बनी हुई रणनीतिक साझेदारी है। लेकिन युद्ध के समय रिश्ते सिर्फ पुराने संबंधों से नहीं, बल्कि हालात और हितों से तय होते हैं।
सबसे पहले रूस को समझिए। अगर अमेरिका मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक उलझा रहता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा रूस को हो सकता है। रूस पहले से यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसा हुआ है। Volodymyr Zelenskyy को मिल रहे अमेरिकी और यूरोपीय हथियारों ने अब तक Vladimir Putin की राह मुश्किल बनाई हुई है।
लेकिन अगर अमेरिका और यूरोप का ध्यान ईरान के संघर्ष में बंट जाता है, तो रूस के लिए यूक्रेन के मोर्चे पर दबाव कम हो सकता है।
रूसी विदेश मंत्री Sergey Lavrov पहले ही कह चुके हैं कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के खिलाफ किसी भी अमेरिकी-इजरायली सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए मॉस्को हर संभव कोशिश करेगा।
रूस पहले भी ईरान को कई तरह के सैन्य उपकरण दे चुका है—
Su-35 फाइटर जेट,
S-300 एयर डिफेंस सिस्टम,
Verba शोल्डर-फायर मिसाइल,
Mi-28 अटैक हेलीकॉप्टर,
और Yak-130 ट्रेनर विमान।
यानी रूस नहीं चाहेगा कि ईरान इतनी जल्दी कमजोर पड़ जाए।
अब बात चीन की। चीन को इस संघर्ष में खतरे से ज्यादा अवसर दिखाई देता है। अगर अमेरिका ईरान के संघर्ष में उलझता है, तो चीन को अपनी वैश्विक ताकत बढ़ाने का मौका मिल सकता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा है ताइवान। Taiwan को लेकर चीन और अमेरिका के बीच पहले से तनाव है। अगर अमेरिका मिडिल ईस्ट में व्यस्त हो गया, तो चीन के लिए ताइवान के मामले में रणनीतिक फायदा हो सकता है।
तीसरा, मिडिल ईस्ट में चीन का प्रभाव बढ़ सकता है।
और चौथा, युद्ध के कारण दुनिया में हथियारों की मांग और तेज हो सकती है, जिससे कई देशों को रणनीतिक और आर्थिक फायदा मिलेगा।
हालांकि चीन ने 2005 के बाद ईरान को सीधे हथियार बेचना काफी कम कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद वह ईरान को ड्रोन इंजन, रडार सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और बड़ी मात्रा में सोडियम परक्लोरेट जैसे सैन्य उपयोग के रसायन देता रहा है, जिनसे मिसाइलें बनाई जा सकती हैं।
यानी तस्वीर काफी हद तक साफ है।
रूस, चीन और ईरान—इन तीनों का एक बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है, और वह है United States।
और अमेरिका के साथ खड़े हैं उसके यूरोपीय सहयोगी।
ऐसे में अगर रूस और चीन किसी भी स्तर पर खुलकर ईरान के साथ आ गए, तो यूरोप भी चुप नहीं बैठेगा।
और अगर ऐसा हुआ, तो मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष सिर्फ ईरान और इजरायल के बीच की लड़ाई नहीं रहेगा।
यह टकराव बदल सकता है दुनिया के सबसे बड़े और सबसे खतरनाक संघर्ष में
जिसे दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के नाम से जानती है।
